हिसार
जिले के बारे में
हिसार भारत के उत्तर पश्चिम में स्थित हरियाणा प्रान्त के हिसार जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है। यह भारत की राजधानी नई दिल्ली के 164 किमी पश्चिम में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 10 एवं राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 65 पर पड़ता है। यह भारत का सबसे बड़ा जस्ती लोहा उत्पादक है। इसीलिए इसे इस्पात का शहर के नाम से भी जाना जाता है पश्चिमी यमुना नहर पर स्थित हिसार राजकीय पशु फार्म के लिए विशेष विख्यात है। अनिश्चित रूप से जल आपूर्ति करनेवाली घाघर एकमात्र नदी है। यमुना नहर हिसार जिला से होकर जाती है। जलवायु शुष्क है। कपास पर आधारित उद्योग हैं। भिवानी, हिसार, हाँसी तथा सिरसा मुख्य व्यापारिक केंद्र है। अच्छी नस्ल के साँड़ों के लिए हिसार विख्यात है। हिसार की स्थापना सन 1354 ई. में तुगलक वंश के शासक फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने की थी। घग्गर एवं दृषद्वती नदियां एक समय हिसार से गुजरती थी। हिसार में महाद्वीपीय जलवायु देखने को मिलती है जिसमें ग्रीष्म ऋतु में बहुत गर्मी होती है तथा शीत ऋतु में बहुत ठंड होती है। यहाँ हिन्दी एवं अंग्रेज़ी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाएँ हैं। यहाँ की औसत साक्षरता दर 811.04 प्रतिशत है। 1 9 60के दशक में हिसार की प्रति व्यक्ति आय भारत में सर्वाधिक थी
हिसार पर बहुत सारे साम्राज्यों का शासन रहा है। यह तीसरी सदी ई.पू. में मौर्य राजवंश का, 13 वीं सदी में तुगलक वंश का, 13 वीं सदी में मुगल साम्राज्य का तथा 19 वीं सदी में ब्रिटिश साम्राज्य का भाग रहा है। भारत की स्वतन्त्रता के बाद यह पंजाब प्रान्त का भाग बना दिया गया किन्तु 1966 ई. में पंजाब के विभाजन के बाद यह हरियाणा का भाग बन गया। मुस्लिम विजय के पूर्व हिसार का अर्ध बलुआ भाग चौहान राजपूतों का अपयान स्थान था। 18 वीं शताब्दी के अंत में भट्टी और भटियाला लोगों ने इसे अधिकृत किया था। 1803 ई. में अंशत: यह ब्रिटिश अधिकार में आ गया किंतु 1810 ई. तक इनका शासन लागू न हो सका। 1857 के प्रथम स्वंत्रता युद्ध, के बाद निरापद रूप से, हिसार ब्रिटिश अधिकार में आ गया।
तुग़लक़ वंश के शासक बादशाह फ़िरोज़ शाह तुग़लक ने 1354 ई. में एक दुर्ग के रूप में हिसार की स्थापना की थी। यह शहर बाद में एक महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया। 1783 ई. के दुर्भिक्ष में हिसार प्राय: पूर्णत: जनहीन हो गया था, किंतु आयरलैंड के साहसी अभियानकर्ता जार्ज थामस ने एक दुर्ग बनवाकर इसे पुन: बसाया। 1867 ई. में हिसार की नगरपालिका का अध्ययन किया गया। यह शहर एक दीवार से घिरा है। जिसमें चार दरवाज़े हैं- नागोरी गेट, मोरी गेट, दिल्ली गेट तथा तलाकी गेट के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ फ़िरोज़ शाह के क़िले व महल के अवशेषों के साथ-साथ कई प्राचीन मस्जिदें हैं, जिनमें जहाज़ भी एक है, जो अब एक जैन मंदिर है। प्राचीन समय में यह हड़प्पा सभ्यता का मुख्य केन्द्र था। प्राचीन समय में यहाँ कई आदिवासी जातियाँ रहती थी। इन जातियों में भरत, पुरू, मुजावत्स और महावृष प्रमुख थी।
रुचि के स्थान
अग्रोहा धाम
ऐसी मान्यता है कि अग्रोहा किसी समय महाराजा अग्रसेन के राज्य की राजधानी था। यह नगर अत्यंत सुसमृद्ध और सम्पन्न था, लेकिन कालान्तर में यह विदेशी आक्रमणों से नष्ट हो गया, परन्तु आज अग्रोहा धाम एक धार्मिक एवं दर्शनीय स्थल के रूप में विकसित हो चुका है। इसकी देखरेख एवं विकास अग्रोहा ट्रस्ट द्वारा की जाती है। अग्रोहा धाम में महाराजा अग्रसेन, कुलदेवी महालक्ष्मी, शक्ति शीला माता मंदिर, मां वैष्णो देवी मंदिर, वीणा वंदिनी सरस्वती मंदिर, हनुमान मंदिर, 90 फुट ऊंची भगवान मारूति की प्रतिमा, महाराजा अग्रसेन का प्राचीन मंदिर, भैरो बाबा का मंदिर, बाबा अमरनाथ की गुफा, हिमानी शिवलिंग, तिरूपति की भव्य मूर्ति एवं शक्ति सरोवर इत्यादि धार्मिक दर्शनीय स्थल हैं। यहां मनोरंजन के लिए नौका विहार एवं बच्चों के लिए आधुनिक झूले, बाल क्रिड़ा केन्द्र (अप्पूघर) भी हैं। यहां श्रद्धालु अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराने आते हैं। भाद्रपद अमावस्या को यहां बड़ा मेला लगता है। अग्रवाल समाज इसे अपना पांचवां धाम मानता है।
राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र
अश्वों के स्वास्थ्य एवं उत्पादन के क्षेत्र में अनुसंधान के लिए राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केन्द्र की स्थापना सातवीं पंच वर्षीय योजना के अन्तर्गत हिसार में की गई। यह संस्थान अश्वों की प्रमुख बीमारियों के उपचार तथा जैविक विकास हेतु भी कार्य कर रहा है। इसके साथ राष्ट्रीय प्रमाणित सुविधाओं को उपलब्ध कराते हुए यह अश्वों के स्वास्थ्य निरीक्षण एवं निगरानी की विविध व्यवस्था भी कर रहा है।
विज्ञान, प्राद्योगिकी, कृषि व चिकित्सा शिक्षा
हिसार शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यहां स्थापित तीन विश्वविद्यालय एवं एक मेडिकल कालेज प्रदेश व पड़ोसी राज्यों से आने वाले छात्र-छात्राओं को विज्ञान, व्यावसायिक एवं सामयिक शिक्षा की मांग को पूरा कर रहे हैं।
लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय
लाल लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय की स्थापना 1 दिसम्बर 2010 को की गई। पशु चिकित्सा महाविद्यालय का साठ वर्षों का इतिहास गौरव पूर्ण रहा है। हिसार के चै0 चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय से जुड़ा यह महाविद्यालय अब ‘पंजाब केसरी’ राष्ट्रभक्त लाला लाजपत राय की स्मृति में एक स्वतंत्र विश्वविद्यालय का रूप ले चुका है। शैक्षणिक सुविधाओं के अतिरिक्त/ पशुचिकित्सालय, प्रयोगशालाएं, शोध हेतु पशु शाला एवं बाड़ा उपलब्ध है। इस विश्वविद्यालय के नये परिसर का निर्माण 300 एकड़ भूमि खण्ड पर किया जा रहा है।
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा हिसार में स्थापित कैम्पस वेटरनरी काॅलेज 2 फरवरी, 1970 को हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के रूप में अस्तित्व में आया जो वर्तमान में चै0 चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के रूप में विकसित हैं, जिसमें एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर, होम सांइस, बेसिक सांइस, स्पोट्र्स एवं एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग व कई अन्य कोर्स की शिक्षा दी जाती है। इस विश्वविद्यालय की संरचना में प्रथम कुलपति ए0एल0 फ्लेचर, आई0सी0एस0 (सेवानिवृत) का बहुत बड़ा योगदान रहा। यह विश्वविद्यालय कृषि शिक्षा, शोध एवं उत्तम तरीके के बीज विकसित करने एवं उसके उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। कृषि के क्षेत्र में नित नए आविष्कार के कारण यह विश्वविद्यालय देश के खाद्यान्न भण्डार को समृद्ध बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
संस्कृति और विरासत
गुजरी महल
बस स्टैंड के पास बने ओ.पी. जिन्दल पार्क के सामने स्थित गुजरी महल जो बारादरी के नाम से भी जानी जाती है, का एक अपना रोचक इतिहास है। ऐसी किवंदती है कि गुजरी महल सुलतान फिरोजशाह तुगलक ने अपनी प्रेयसी गुजरी के रहने के लिए बनाया था, जो हिसार की रहने वाली थी। महल की बनावट से लगता है सुल्तान ने गुजरी के ऐशो-आराम का खास ख्याल रखा था। गुजरी महल की चैड़ी मोटी दीवार, संकरा रास्ता तुगलक भवन निर्माण शैली की विशेषता को दर्शाता है।
जहाज कोठी
आयरलैंट का निवासी जार्ज थामस, जिसने सिरसा से रोहतक तक के क्षेत्र पर अपना शासन स्थापित किया, ने जहाज कोठी का निर्माण सन् 1796 में अपनी रिहायश के लिए करवाया था। राज्य सरकार द्वारा सुरक्षित घोषित यह स्मारक देखने में समुद्री जहाज की तरह प्रतीत होता है। प्रारम्भ में यह स्मारक जार्ज कोठी के नाम से जाना जाता था लेकिन समय गुजरने के साथ जार्ज कोठी को जहाज कोठी के नाम से जाना जाने लगा। अब इस ऐतिहासिक स्मारक में क्षेत्रीय पुरातात्विक संग्रहालय स्थापित है।